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Showing posts from 2019

डरती हूँ मैं

डरती हूँ मैं कि क्या करूँ ? क्या हिम्मत रखने की गुंजाइश अभी बाकी है ? हँसते हो तुम, सोचते हो कि कमज़ोर हूँ मैं, डरपोक भी, शायद मुझे अपना बल दिखाना अभी बाकी है। तुम्हें यदि ऐसा खयाल है कि मेरी पहचान है तुमसे और मान सम्मान भी तो डरती हूँ मैं ! डरती हूँ मैं तुम्हारे इस खयाल से, हँसते हो तुम, सोचते हो, तुम्हारी उंगली पर नाचता खिलौना हूँ मैं, कि कमज़ोर हूँ मैं, डरपोक भी शायद मुझे अपना परिचय देना अभी बाकी है। और यदि तुम्हें ऐसा खयाल है कि मैं देवी हूँ ! कोई सीता या काली हूँ तो डरती हूँ मैं ! डरती हूँ मैं तुम्हारे आदर से, मुझे दिए गए सत्कार से, हँसते हो तुम, सोचते हो, तुम्हारे कर्मों को सहन करती हुई मौन मूरत हूँ मैं ! कि कमज़ोर हूँ मैं, डरपोक भी, शायद मुझे अपने रूप का अनुसरण करना अभी बाकी है। क्योंकि तुम्हारी दी पहचान है ज़्यादा कुछ ख़ास नहीं, मुझे देवी-सा पूजने का ढोंग है आया कुछ रास नहीं, डरती हूँ तुम्हारे मैले मन से जो मुझ पर अपना हक़ समझता है डरती हूँ मैं अकेले चलने से, कि कदम हर मर्द पर अब शक करता है। हँसते हो तुम, सोचते हो, कि मिट्टी से उभरी नाज़ुक गुड़िया ...

Sold

There is a giant mountain Behind another mountain, Lit by houses Like stars laden to its silhouette. And here I am, in a desert. Where giant are the buildings Laden with all fancy and bright, Making me blind. There is a gushing river, Schools of fish, The Victoria bridge I looked from. Beside which lies an ancient cave. And here I am, on a parapet, Watching a dead stream. Beside which lies a new road. Golden but grave. There is plenty of air, Pure and cold. Fragrance of the fresh, An elixir to breath. And here I am, amidst the puffs Of smoke, flying dust. For the future’s lure, My breath is sold. There is a forest. A forest of chirps, Of snarls, roars. Belonging to the fittest. Ensembled present of hopes. And here I am, again in a forest Of concrete, horns and honks. Belonging to the weaks Of intelligent stature. Entangled in the illusion of the past, Now, fixing futures. There is a sky so blue. Where my dreams would fly With a circus...

वो कहते हैं कि सरकार सड़क बढ़ा रही है...

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PART 1, 2013  -  याद ही है तेरी बस तूने देखा ? वो आँगन जिस पर हमने रंगोली बनायी थी, न जाने क्यों अब धूल हो गयी है।  जिस आँगन में... वो! कुर्सियों का घर बनाया था, न जाने क्यों अब मुसाफिरों का मुकाम बन गयी है।  हमारी यादें उस आँगन में सिमटी हुई,  अब न जाने किस-किस की तस्वीर हो गयी है, ताश छुपाये कोने वाला कमरा भी ढेर हो गया है।  उससे भी पहले ढेर हो गयी वो बालकनी, जहाँ नाना संग *ब्यास को घूरा करते थे।  वो कहते हैं कि सरकार सड़क बढ़ा रही है... घर बिखरता देख रही आँखों में,  दर्द का सैलाब उनके भी है।। हमारे बचपन के किस्सों को न जाने कितने पहिये कुचलने लगे हैं।  शिकायत करूँ ? क्या कहूं !  दिल हल्का करने के लिए तू भी साथ नहीं है।  हमारी हंसी की फुलकारियों को , न जाने कितने हॉर्न शांत कर गए हैं ! खबर दे दूँ तुझे, कि अब उस गेट पर कभी झूलना नहीं होगा, उस खेत के पेड़ों पर फिर चढ़ना नहीं होगा, उस चूल्हे की गर्माहट में खुद को सेकना नहीं होगा, वो कहते हैं कि सरकार सड़क बढ़ा रही है... छुट्टियों के ...

Dear Spiti

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Thou! Like the Great Grandfather, Strange and Strong. Proud, in way Thou stand, By a river, narrow but long. Stubborn in Thy dominance, Thou crouch on, to guard. Rocks, trees, in reverence, Turn bare and hard. Thy strict facial expression, Hones the attitudes of lives. Thy high altitudes, Infuse coldness in mind. Thence mind relentlessly longs Solitude in Thine old arms. In a trance, I leave the thoughts Of anything I can jot. Before Thy cold desert, Dear Spiti, My being is only a dot, My being is only a dot.

क्या होता है तुम्हारे साथ भी ऐसा ?

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क्या होता है तुम्हारे साथ भी ऐसा ? या मैं कुछ अलग हूँ ! इस दुनिया में चल रही हज़ारों लोगों की ज़िन्दगी चंद नमूनों के कारण थम जाती है। वो मदारी के भांति उन्हें नचाते रहते हैं। शायद... मैं भी उसी भीड़ में एक जमूरा हूँ। मगर ये कैसा नाच है ? जिसमें किसी की मर्ज़ी नहीं होती, जिसमें कदम चलते तो हैं मगर मानो किसी जंग के लिए। ऐसी जंग जिसमें न तलवार है न ही कोई बन्दूक। बस, एक सोच है। सोच ! जिसके तले ये तमाशा बन रहा है और मैं इस  नाटक में समायी हुई हूँ। क्या तुम भी इस नाटक में कोई कलाकार हो? या मैं कुछ अलग हूँ ! आँखें हैं सभी की जो देखती होंगी सब कुछ। हैरान न होना यदि मैं कहुँ की मेरी भी आँखें हैं जो स्वयं को दुनिया में पाकर स्वयं से अनजान और कमज़ोर पा रही हैं।  इस भाग-दौड़ में तो मैं भूल ही गयी कि सबके पास एक अपनी छोटी ज़िन्दगी है, जिसे बड़ा कहने में मुझे कोई हर्ज़ नहीं, जिसे सजाने की चाह में सब किसी सोच की लपेट में हैं, माफ़ करना, चपेट में हैं।  क़ैदख़ाने की आज़ादी में अब अपने पंख फड़फड़ा रही हूँ किसी पंछी के भांति और विशवास है साथ कि एक दिन  मैं भी महात्माओं के भांति उस सोच का...